(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.175. अध्यायः 175
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
बृहस्पतीना युधिष्ठिरंप्रत्यहिंसाप्रशंसनम्। 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

अहिंसा वैदिकं कर्म ध्यानमिन्द्रियसंयमः।
तपोऽथ गुरुशुश्रूषा किं श्रेयः पुरुषं प्रति॥ 13-175-1(88443)
बृहस्पतिरुवाच। 13-175-2x(7377)
सर्वाण्येतानि धर्मस्य पृथग्द्वाराणि नित्यशः।
शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ॥ 13-175-2(88444)
हन्त निःश्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम्।
अहिंसापाश्रयं धर्मं दान्तो विद्वान्समाचरेत्॥ 13-175-3(88445)
त्रिदण्डं सर्वभूतेषु निधाय पुरुषः शुचिः।
कामक्रोधौ च संयम्य ततः सिद्धिमवाप्नुते॥ 13-175-4(88446)
अहिंसकानि भूतानि दण्डेन विनिहन्ति यः।
आत्मनः सुखमन्विच्छन्स प्रेत्य न सुखी भवेत्॥ 13-175-5(88447)
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः।
त्यक्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते॥ 13-175-6(88448)
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति ह्यपदस्य पदेषिणः॥ 13-175-7(88449)
न तत्परस्य संदध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः।
एष साङ्ग्राहिको धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥ 13-175-8(88450)
प्रख्यापने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये।
आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति॥ 13-175-9(88451)
यथा परः प्रक्रमते परेषु
तथा परे प्रक्रमन्ते परस्मिन्।
निषेवते स्वसमां जीवलोके
यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः। 13-175-10(88452)
वैशम्पायन उवाच। 13-175-11x(7378)
इत्युक्त्वा तं सुरगुरुधर्मराजं युधिष्ठिरम्।
दिवामचक्रमे धीमान्पश्यतामेव नस्तदा॥ ॥ 13-175-11(88453)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 175 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-175-7 सर्वेषां भूतानामात्मभूतस्याऽऽदुःखेनेव परदुःखेनाप्युद्विजतः॥ 7-175-10 हिंसितो हिनस्ति पालितः पालयति तस्मःत्पालयेदेव नो हिंसयेदित्यर्थः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.